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ईसाई धर्म क्या है

 

ईसाई धर्म क्या है। निबंध।

ईसाई धर्म- ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह थे, जिनका जन्म रोमन साम्राज्य के गैलीली प्रांत के नजरथ नामक स्थान पर 6 ईसा पूर्व में हुआ था। उनके पिता जोजेफ एक बढ़ई  थे तथा माता मेरी या (मेरीयम) थी। वे दोनों यहूदी थे। इसाई शास्त्रों के अनुसार मेरी को उनके माता-पिता ने देवदासी के रूप में मंदिर को समर्पित कर दिया था। ईसाई विश्वासों के अनुसार ईसा मसीह के मेरी के गभॆ में आगमन के समय मेरी कुंवारी थी। इसलिए मेरी को ईसाई धर्मा लंबी वर्जिन मेरी या "कुंवारी मेरी" तथा ईसा मसीह को ईश्वर की दिव्य पुरुष मानते हैं। ईसा मसीह के जन्म के समय यहूदी लोग रोम साम्राज्य के अधीन थे। और उससे मुक्ति के लिए व्याकुल थे। उसी समय जॉन दी बैस्टिस्ट नामक एक संत जॉर्डन घाटी में भविष्यवाणी की थी कि यहूदियों की मुक्ति के लिए ईश्वर शीघ्र ही एक मसीहा भेजने वाला है। उस समय ईसा की आयु अधिक नहीं थी परंतु कई वर्षों के एकांतवास के पश्चात उनमें कुछ विशिष्ट शक्तियों का संचार हुआ और उनके स्पर्श से  अंधों को दृष्टि, गूंगों को बाणी, तथा मृतकों को जीवन मिलने लगा, फलतः चारों ओर ईशा को प्रसिद्धि मिलने लगी। उन्होंने दीन दुखियों के प्रति प्रेम और सेवा का  प्रचार किया। यरूशलम में उनके आगमन एवं निरंतर बढ़ती जा रही लोकप्रियता से पुरातन पंथी पुरोहित तथा सत्ताधारी वर्ग सशंकित हो उठा और उन्हें झूठे आरोपों में फंसाने का प्रयास किया। यहूदियों की धर्म सभा ने उन पर स्वयं को ईश्वर का पुत्र और मसीहा होने का दावा करने का आरोप लगाया और अंततः उन्हें सलीब (क्रास) पर लटका कर मृत्यु दंड की सजा दी गई। परंतु सलीब पर भी उन्होंने अपने विरुद्ध षड्यंत्र करने वालों के लिए ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उन्हें माफ करें क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि वे क्या कर रहे हैं। ईसाई मानते हैं कि मृत्यु के तीसरे दिन ही ईसा मसीह पुनः जीवित हो उठे थे।
     ईसा मसीह के शिष्यों ने उनके द्वारा बताए गए मार्ग अर्थात ईसाई धर्म का फिलिस्तीन में सर्वप्रथम प्रचार किया यहां से वह रोम और फिर सारे यूरोप में फैला। वर्तमान में यह विश्व की सबसे अधिक अनुयायियों का वाला धर्म है। ईसाई लोग ईश्वर को 'पिता' और ईसा मसीह को ईश्वर पुत्र मानते हैं। ईश्वर, ईश्वर पुत्र ईसा मसीह और पवित्र आत्मा- ये तीनों इसाई त्र्यंक (ट्रीनीति) माने जाते हैं। ईसाई धर्म की कुछ अन्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-

  1. आस्था सूत्र- ईसाई धर्मावलंबी प्रार्थना तथा अनुष्ठानों के अवसर पर निम्न आस्था सूत्र का स्मरण करते हैं - "मैं आकाश तथा पृथ्वी एवं सभी गोचर अगोचर वस्तुओं की सीजन एकमात्र महा शक्तिमान पता प्रभु तथा उनके पुत्र ईसा मसीह में विश्वास करता हूं"

2.पवित्र पुस्तक- ईसाई धर्म की पवित्र पुस्तक बाइबिल या इंजील है, जिसके दो भाग हैं, १-ओल्ड टेस्टामेंट जिसमें यहूदी इतिहास तथा धर्म कथाएं वर्णित है, और (२)न्यू टेस्टामेंट जिसमें, इसाई धर्म संबंधित विचार विश्वास तथा इतिहास वर्णित हैं।

बाइबिल- ईसाई धर्म का पवित्र ग्रंथ बाइबिल है। जिसके भाग ओल्ड टेस्टामेंट और न्यू टेस्टामेंट है। ईसाइयों का विश्वास है कि बाइबल की रचना विभिन्न व्यक्तियों द्वारा 2,000 - 2500 वर्ष पूर्व की गई थी। वास्तव में यह ग्रंथ ईसा पूर्व नवी शताब्दी से लेकर ईशा प्रथम शताब्दी के बीच लिखे गए 73 लेख श्रृंखलाओं का संकलन है, जिसमें से 46 ओल्ड टेस्टामेंट में और 27 न्यू टेस्टामेंट में संकलित है। जहां ओल्ड टेस्टामेंट में यहूदियों के इतिहास और विश्वासों का वर्णन है वही न्यू टेस्टामेंट में ईसा मसीह के उपदेशों एवं जीवन का विवरण है।


भारत में ईसाई धर्म- ईसाई धर्म का भारत में प्रवेश अत्यंत प्राचीन काल से हो चुका था। ईसा मसीह के प्रमुख शिष्यों में से एक संत थॉमस ने प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में ही भारत में मद्रास के पास आकर इस ईसाई धर्म का प्रचार किया था। उसी समय से इस क्षेत्र में ईसाई धर्म का स्वतंत्र रूप से प्रसार होता रहा हैं।16 वीं सदी में पुर्तगालियों के साथ आए रोमन कैथोलिक धर्म प्रचारकों के माध्यम से उनका संपर्क पोप के कैथोलिक चर्च से हुआ । परंतु भारत के कुछ ईसाइयों ने पोप की सत्ता को  स्वीकृत करके केरल में जेकोबाइट चर्च की स्थापना की। केरल में कैथोलिक चर्च से संबंधित तीन शाखाएं दिखाई पड़ती हैं- (१) सीरियल मालाबारी (२) सीरियन मालीकारी और (३) लैटन रोमन कैथोलिक चर्च की लैट्रिन शाखा की भी 2 वर्ग दिखाई पड़ते हैं

 पहला गोवा, मंगलौर , महाराष्ट्रीयन समूह जो पश्चिमी विचारों से प्रभावित था तथा दूसरा तमिल समूह जो प्राचीन प्राचीन भाषा संस्कृति से जुड़ा रहा । काका प्रतिष्ठा , फादर स्टीफेंस,  फादर्स डे नोबिल आदि दक्षिण भारत के प्रमुख ईसाई धर्म के प्रचारक थे।

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