करवा चौथ व्रत कथा- सरल हिंदी भाषा में इस ब्लॉग में बताया गया है इसमें व्रत की कथा, व्रत का विधान तथा 4 कहानियों एवं आरतियों सहित विस्तृत वर्णन किया गया है। यह माना जाता है कि इस व्रत का प्रभाव बहुत प्राचीन से है। यह व्रत सुहागिन स्त्रियां अपने पति के दीर्घायु के लिए करती हैं । तथा मनोकामना करती हैं उनका पति अच्छे स्वास्थ्य और अच्छी जीवनशैली सुख में जीवन व्यतीत करें।
करवा चौथ व्रत कथा।
यह व्रत अति प्राचीन है। इसका प्रचलन महाभारत से पूर्व का है। यह व्रत सौभाग्वती महिलाओं के लिए उत्तम माना गया है। सामान्य मान्यता के अनुसार सुहागिनों इस व्रत को अपने सुहाग (पती) की दीर्घायु के लिए रखती हैं। कहा जाता है कि इसे पाण्डवों की पत्नी को पति ने भी किया था।
समय-
यह व्रत कार्तिक कृष्ण की चंद्रोदय चतुर्थी में किया जाता है।
व्रत की विधि-
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ करते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह बहुत ही श्रेष्ठ व्रत है। स्त्रियां इस व्रत को पति के दीर्घ जीवी होने के लिए करती हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां चावल पीसकर दीवार को करवा चौथ बनाती हैं जिसे वर कहते हैं।
इस करवा चौथ में पति की अनेक रूप बनाए जाते हैं तथा सुहाग की वस्तुएं, जैसी- चूड़ी , बिंदी, बिचुआ, मेहंदी और महावर आदि के साथ साथ दूध देने वाली गाय, करुआ बेचने वाली कुम्हारी, महावर लगाने वाली नाइन , चूड़ी पहने वाली मनिहारी, सात भाई और उनकी इकलौती बहन, सूर्य , चंद्रमा, गौरा गौरी पार्वती आदि देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं।
सुहागिन स्त्रियों को इस दिन निर्जल व्रत रखना चाहिए। रात्रि को जब चंद्रमा निकल आए, तब उसे अध्य देकर भोजन करना चाहिए । पीली मिट्टी की गौरव बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिए।
नोट:- यदि दीवार पर करवा चौथ बनाने में कोई असुविधा हो तो करवा चौथ का चित्र बाजार से लाकर दीवार पर चिपकाया जा सकता है।
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