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करवा चौथ व्रत कथा - प्रथम कथा

 करवा चौथ व्रत कथा- प्रथम कथा 

एक साहूकार था, उसके साथ बेटे और एक बेटी थी। साथ में भाई व बहन एक साथ बैठकर भोजन करते थे। एक दिन कार्तिक की चौथ का व्रत आया तो भाई बोला कि बहन आओ भोजन करें। बहन बोली कि आज करवा चौथ का व्रत है, चांद उगने पर ही खाऊंगी। सब भाइयों ने सोचा कि चांद उगने तक बहन भूखी रहेगी तो एक भाई ने दिया जलाया, दूसरे भाई ने छलनी लेकर उसे ढॅंका और नकली चाॅंद दिखा कर बहन से करने लगे कि चल चांद उग आया है- अध्य दे ले। बहन अपनी भाभियों से कहने लगी  चलो अध्य दें तो भाभियां बोलीं, तुम्हारा चांद  उगा  होगा हमारा चांद तो रात को उगेगा। बहन ने जब अकेले ही अध्य दे दिया और खाने लगी तो पहले ही ग्रास में बाल आ गया, दूसरे ग्रास में कंकड़ आया, और तीसरा ग्रास मुंह की ओर किया तो उसकी ससुराल से संदेश आया उसका पति बहुत बीमार है, जल्दी भेजो। मां ने जब लड़की को विदा किया तो कहा कि रास्ते में जो भी मिले उसके पांव लगना और जो कोई सुहागा का आशीष दे तो उसके पल्ले में गांठ लगाकर उसे कुछ रुपए देना। बहन जब भाइयों से विदा हुई तो रास्ते में जो भी मिला उसने यही आशीष दिया की तुमने सात भाइयों की बहन बनी रहो, तुम्हारे भाई सुखी रहें और तो उनका सुख देखो। सुहागा आशीष किसी ने भी नहीं दिया।

             जब वह ससुराल पहुंची तो दरवाजे को उसकी छोटी ननद खड़ी थी, वह उसके भी पांव लगी तो उसने कहा कि सुहागन रहो, सपूति हो तो उसने यह सुनकर पल्ले में गांठ बाधी और ननद को सोने का सिक्का दिया। तभी भीतर गई तो सास ने कहा कि पति धरती पर पड़ा है, तो वह उसके पास जाकर उसकी सेवा करने के लिए बैठ गई। बाद में सासनी दासी के साथ बची कुची रोटी भेज दी। इस प्रकार से समय बीतते-बीतते मृगसीर (मार्गशीर्ष) की चौथ आई तो चौथ माता बोली- करवा लें,करवा लें, भाइयों की प्यारी करवा लें। लेकिन जब उसे चौथ माता नहीं दिखलाई जी तो वह बोली- हे माता! आपने मुझे उजाड़ा है तो आप ही मेरा उद्धार करोगी। आपको मेरा सुहाग देना पड़ेगा। तो उस चौथ माता ने बताया कि पौष की चौथ आयेगी,  वह मेरे से बड़ी है, उससे ही सब कहना। वही तुम्हारा सुहाग वापस देगी। पौष की चौथ आकर चली गई, माघ की चली गई, फाल्गुन की चली गई, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ,आषाढ़ और श्रावण,भादों की सभी चौथ आयीं और यही कहकर चली गई कि आगे वाली को कहना। आश्रिन (क्वार) की चौथ आई तो उसने बताया कि तुम पर कार्तिक की चौथ नाराज हैं, उसीने तुम्हारा सुहाग लिया है, वही वापस कर सकती है। वही आयेगी तो पांव पकड़ कर विनती करना। यह बताकर वह भी चली गई।

           जब कार्तिक की चौथ आई तो वह गुस्से में बोली- भाइयों की प्यारी करवा लें, दिन में चांद उगनी करवा लें, व्रत खंडन करने वाली करवा लें। भूखी करवा लें,यह सुनकर वह चौथ माता को देखकर उनके पांव पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगी। हे चौथ माता! मेरा सुहाग तुम्हारे हाथों में है- आप की मुझे सुहागिन करें। तो माता बोली- पापिन! हत्यारिन! मेरे पांव पकड़कर क्यों बैठ गई? तब वह बोली कि मुझसे भूल हुई उसे क्षमा कर दो, अब भूल नहीं करूंगी, तो चौथ माता ने प्रसन्न होकर आंखों से काजल, नाखूनों में से मेंहदी और टीके में से रोली लेकर छोटी उंगली से उसके पति पर छींटा दिया तो वह उठकर बैठ गया और बोला कि मैं बहुत सोया। वह बोली- क्या सोए, मुझे तो 12 महीने हो गए, अब जाकर चौथ माता ने मेरा सुहाग लौट आया। तब उसने कहा कि जल्दी से माता का पूजन करो। तब चौथ की कहानी सुनी, करवा का पूजन किया तो प्रसाद खाकर दोनों पति-पत्नी चौपड़ से नहीं बैठ गए। नीचे से दासी आई, उसने उन दोनों को  चौपड़ - पांसे से खेलते देखा तो उसने सासूजी को जाकर बताया। तब से सारे गांव में यह बात प्रसिद्ध हो गई कि सब स्त्रियां चौथ का व्रत करें सुहाग अटल रहेगा। जिस तरह से साहूकार की बेटी का सुहाग दिया, उसी तरह से चौथ माता सबको सुहागिन रखें। यही करवा चौथ के उपवास की सनातन महिमा है।

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