इस्लाम धर्म क्या है। निबंध
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद साहब थे, जिनका जन्म 29 अगस्त 570 को सऊदी अरब के मक्का नामक स्थान में कुरैशियों काबिले के अब्दुल्लाह नामक व्यापारी के घर हुआ था । जन्म के पूर्व ही पिता की और 5 वर्ष की आयु में माता की मृत्यु हो जाने के फलस्वरूप उनका पालन पोषण उनके दादा मुतल्लिक और चाचा अबू तालिब ने किया था। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने खदीजा नामक एक विधवा से विवाह किया । मोहम्मद साहब के जन्म के समय अरबवासी अत्यंत पिछड़ा, कबीलाई और चरवाहों की जिंदगी बिता रहे थे, अतः मोहम्मद साहब ने उन सभी कबिलो लोगों को संगठित करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का प्रयास किया । 15 वर्ष तक व्यापार में लगे होने के पश्चात वह कारोबार छोड़कर चिंतन मनन में लीन हो गए। मक्का के समीप हीरा की चोटी पर कई दिनों तक चिंतनशील रहने के उपरांत उन्हें देवदूत जिबरिल का संदेश प्राप्त हुआ कि वह जाकर कुरान शरीफ के रूप में प्राप्त ईश्वरीय संदेश का प्रचार करें । तत्पश्चात उन्होंने इस्लाम धर्म का प्रचार शुरू किया। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, जिसे मक्का का पुरोहित वर्ग भड़क उठा और अंततः मुहम्मद साहब ने 16 जुलाई 6 22 को मकान छोड़कर वहां से 300 किलोमीटर उत्तर की ओर यश्री मदीना की और कुच कर दिया । उनकी यह यात्रा इस्लाम में हिजरत कहलाती है। इसी दिन से हिजरी संवत का आरंभ माना जाता है। कालांतर में 630 ई. में अपने लगभग 10000 अनुयायियों के साथ मोहम्मद साहब ने मक्का चढ़ाई करके उसे जीत लिया और वहां इस्लाम को लोकप्रिय बनाया। 2 वर्ष पश्चात 8 जून 632 में उनका निधन हो गया।
इस्लाम शब्द का अर्थ है- अल्लाह को समर्पण। इस प्रकार मुसलमान वह है, जिसने अपने आपको अल्लाह को समर्पित कर दिया, अर्थात इस्लाम धर्म के के नियमों पर चलने लगा । इस्लाम धर्म का आधारभूत सिद्धांत अल्लाह को सर्वशक्तिमान, एकमात्र ईश्वर और जगत का पालक तथा हजरत मोहम्मद को उनका संदेशवाहक या पैगंबर मानना है। यही बात उनके 'कलमे' में दोहराई जाती है- "ला इलाहा इलल्लाह मुहम्मदुरसूलुल्लाह" अर्थात अल्लाह एक है, इसके अलावा कोई दूसरा नहीं और मोहम्मद उसके रसूल या पैगंबर हैं। कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व मुसलमान यह कलमा पढ़ते हैं। इस्लाम में अल्लाह को कुछ हद तक साकार माना गया है, जो इस दुनिया से काफी दूर सातवें आसमान पर रहता है। वह अभाव शुन्य में फर्क सिर्फ 'कुन' कहकर ही सृष्टि रचता है । उसकी रचनाओं में आग से बने फरिश्ते और मिट्टी से बने मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हैं । गुमराह फरिश्तों को शैतान कहा जाता है । इस्लाम के अनुसार मनुष्य सिर्फ एक बार दुनिया में जन्म लेता है। मृत्यु के पश्चात पुनः वह ईश्वरी कयामत के दिन जी उठता है और मनुष्य के रूप में किए गए अपने कर्मों के अनुसार ही जन्नत स्वर्ग या नरक पाता है ।
पैगंबर मोहम्मद कही हुई बातें और उनकी स्मृतियों का 'हदीस' नामक ग्रंथ में संग्रह है। इस्लाम धर्म में कर्म की पांच भेद किए गए हैं -(१) नित्य, (२) नौमित्तिक, (३) काम्य, (४) असम्मत तथा (५) निषिद्ध। 'नित्य' वह आधारभूत कर्म है, जिन्हें हर रोज करना चाहिए-(१) इस्लाम में निम्न पांच कर्तव्यों को हर मुसलमान के लिए अनिवार्य बताया गया है प्रतिदिन पांच वक्त( फजर, जुहर,असर, मगरिब, ईशा) नमाज पढ़ने, २- जरूरतमंदों को जकात दान देना,(३) रमजान के महीने में सूर्योदय सूर्योदय के पहले से लेकर सूर्या सूर्यास्त तब रोजा रखना, (४) जीवन में कम से कम एक बार हज अर्थात मक्का स्थित काबा की यात्रा करना, तथा (५) इस्लाम की रक्षा के लिए जिहाद धर्म युद्ध करना।
नैमित्तिक कर्म वे कर्म है, जिन्हें करने पर पुण्य प्राप्त होता है, परंतु न करने से पाप नहीं होता । काम्य वे कर्म है, जो किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं । असम्मत वह कर्म है वे करना है जिनको करने का धर्म सम्मति तो नहीं देता, करने पर करता को दण्डनीय भी नहीं ठहराता। निषिद्ध (हराम) कर्म वे हैं, जिन्हें करने की धर्म मना ही करता है और इसके करता को दण्डनीय ठरहता है।
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